भंगियों की व्यथा और शहर का प्रदूषण Poem by Pushp Sirohi

भंगियों की व्यथा और शहर का प्रदूषण

सुबह शहर सो रहा था,
और वे जाग चुके थे।

जब सड़कों पर
अभी सूरज की रोशनी नहीं उतरी थी,
उनके हाथों में
झाड़ू उतर चुकी थी।

जिस शहर को
स्वच्छ दिखाई देना था,
उसकी गंदगी
किसी और के हिस्से में आती थी।

कभी उन्हें नामों से पुकारा गया,
कभी जाति से,
कभी उनके काम से—

पर उनके हाथों ने
शहर को हर सुबह
एक नई शुरुआत दी।

आज शहर की हवा में
धुआँ है।

गाड़ियों का धुआँ,
कारखानों का धुआँ,
निर्माण की धूल,
कूड़े के ढेर से उठता धुआँ—

और उसी हवा में
वे सबसे पहले उतरते हैं।

मास्क किसी के चेहरे पर है,
किसी के पास सिर्फ कपड़ा।

हवा सबकी है,
पर उसका बोझ
सब पर बराबर नहीं पड़ता।

शहर कहता है—

"Air Pollution! "

वे कहते हैं—

"हम तो वर्षों से
इस हवा के साथ
जी रहे हैं।"

सड़क पर गाड़ियाँ दौड़ती हैं,
पीछे धुआँ छोड़ती हैं।

वे सड़क किनारे
उस धुएँ के बीच
शहर को साफ करते हैं।

एक ओर
शहर स्वच्छता अभियान
की तस्वीर लगाता है,

दूसरी ओर
जिस हाथ ने कूड़ा उठाया,
उस हाथ की सुरक्षा
कभी तस्वीर नहीं बनती।

कभी गंदगी
उनकी पहचान बना दी गई,

जबकि सच यह है—

गंदगी उनकी नहीं थी।

गंदगी समाज की थी।

और उसे उठाने का काम
उनके हिस्से में डाल दिया गया।

आज हवा भी पूछ रही है—

"जिस शहर को
तुम साफ कहते हो,
क्या उसके सफाईकर्मियों की
जिंदगी भी साफ है? "

जिस शहर को
सांस लेने का अधिकार चाहिए,
उसे यह भी समझना होगा—

स्वच्छ हवा,
स्वच्छ पानी,
स्वच्छ सड़क

के साथ

स्वच्छ सम्मान भी चाहिए।

अब समय है
सिर्फ शहर की हवा साफ करने का नहीं,

उस सोच को साफ करने का भी
जो किसी इंसान को
सिर्फ उसके काम से पहचानती है।

क्योंकि—

झाड़ू हाथ में होना
छोटापन नहीं,

छोटा वह समाज है
जो सफाई करने वाले हाथ को
सम्मान नहीं देता।

और जिस दिन
शहर की हवा साफ होगी,

उस दिन हमारी कोशिश यह भी हो—

कि उस हवा में
हर सफाईकर्मी
अपना सिर उठाकर
सांस ले सके।

क्योंकि शहर की असली सफाई

सिर्फ सड़कों से कूड़ा हटाना नहीं—

बल्कि

इंसान और इंसान के बीच
जमी हुई गंदगी हटाना भी है।

और एक अजीब विडंबना भी है—

जो लोग रोज़
शहर की गंदगी से लड़ते हैं,
वे कभी-कभी
उन जीवों को भी
दुश्मन समझने लगते हैं
जो उसी गंदगी में
जीवित रहने का रास्ता खोजते हैं।

सुअर हों या कूड़े के ढेर,
गंदगी का सवाल
किसी धर्म की सीमा नहीं जानता।

और जब यही सवाल
मुस्लिम पड़ोसियों के साथ
धार्मिक या सामाजिक तनाव बन जाता है,

तो सफाई का प्रश्न
सिर्फ झाड़ू का नहीं रहता—

वह बन जाता है
पहचान, पूर्वाग्रह
और सह-अस्तित्व का प्रश्न।

शहर कहता है—

"कूड़ा हटाओ।"

इंसानियत कहती है—

"पहले नफरत हटाओ।"

क्योंकि सफाईकर्मी का संघर्ष
किसी धर्म के विरुद्ध नहीं,

उस व्यवस्था के विरुद्ध है
जो कुछ लोगों को
गंदगी के सबसे करीब रखती है
और फिर उसी गंदगी का
दोष भी उन्हीं पर डाल देती है।

सच्ची सफाई तब होगी
जब सड़क भी साफ हो,

हवा भी साफ हो,

और मनुष्य के मन में
दूसरे मनुष्य के लिए
जगह भी साफ हो।

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