रूह की पुकार: एक मुकम्मल दास्तां Poem by Pushp Sirohi

रूह की पुकार: एक मुकम्मल दास्तां

कुछ ऐसा कर मेरे मौला, कि उसे मेरी तड़प बना दे,

वो जागती आँखों से भी बस, मेरा ही ख्वाब सजा दे।

मेरी याद की एक ऐसी लहर, उसके ज़हन में उठा दे,

कि दुनिया की हर महफ़िल उसे, ज़हर जैसी लगा दे।

उसकी हर धड़कन में, मेरे नाम की एक गूँज भर दे,

वो जहाँ भी कदम रखे, उसे मेरी ही राहों का मुसाफ़िर कर दे।

मेरी खामोशी उसके कानों में, शोर बन कर गूंजे,

कि मेरे बिना उसे ज़माने की, कोई भी खुशी न सूझे।

वो जो दूर गई है मुझसे, उसे अपनी गलती का एहसास दे,

मेरी यादों के समंदर में, उसे एक गहरी प्यास दे।

वो तड़प कर पुकारे मुझे, जैसे साहिल को लहरें पुकारती हैं,

उसे बता दे कि मेरी दुआएँ ही, उसकी तकदीर संवारती हैं।

बना दे उसे मेरे इश्क़ की मीरा, जो दुनिया को भूल जाए,

मेरी चाहत की आग में जलकर, वो कुंदन बन जाए।

खुदा! तू खुद गवाह बन जा, इस बेपनाह मोहब्बत का,

कि वो रोते हुए आए और, मेरे ही सीने में सुकून पाए।

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