फ़रिश्ते Poem by Pushpa P.

फ़रिश्ते

पलकों के किनारों पर एक बूँद ओस से आँसुओं की
कह गई कई कहानियाँ उसकी वो झूठी सी हँसी,
दिल के दर्द को छुपा लिया मुस्कुराहट के पीछे,
अब तो यू ही एक आशियाँ सजा लिया उसने यू ही घुटते घुटते

दिया हर किसी को हर किसी का हक उसने
पर उसकी दिली ख्वाहिश कभी उससे ना पूछी किसीने
ज़ख्मों को सहलाते सहलाते छोड़ दिये हक़ अपने उसने, ना दिया तब भी उस और ध्यान किसी ने

जीती रही वो हर किसी के लिए पर ना थे दो पल किसी के पास उसे सुनने के लिए
, अकेले अदना रहते काट दी उमर उसने
और ज़िंदगी ने हरबार दगा ही दिया उसे

चली गई वो घुटते घुटते अपनी अंतिम मंजिल तक तब हरेक ने दिखावटी आँसू बहाकर मीठी मीठी अलंकृत शब्दों से बिरदाया उसे

क्यों होती है किसी के जाने के बाद ही उस इंसा की क़ीमत दुखी दिल को क्यों सहलाया नहीं जाता कभी जीते जी, मरने के बाद मुर्दे को क्या फ़र्क़ पड़ेगा तुम हँसो रोवो या तारीफ़ें करो
इंसा को दे दो साथ जब कोई अपना हो तुम्हारे साथ ही ना दे सके साथ उसको तभी तो उसके जाने के बाद लगता है मुझे ये तुम्हारा रोना नाटक

होते हैं नसीबों वाले वो लोग जो पा जाते हैं अपनों का अपनापन
वरना अब तो दर्दे दिल की दवा सिर्फ और सिर्फ इंसा का अंत ही है

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