शहादत का स्वप्न Poem by Rajnish Rajan

शहादत का स्वप्न

स्वर मिला,
समर्पण किया,
देश ने हुंकार भरी।
रात को दिन,
नींद को छिन,
अपनों के बिन,
देश ने अपने सपनों का शृंगार किया।

मिली आज़ादी जीने को,
मन से गुलामी हटाने को,
स्वर दिया,
संघर्ष किया,
जवानों ने बलिदान दिए।
कर्म किए,
कर्मठ बने,
वक्त पड़े मस्तक दिए,
दृढ़ किया,
समर्पण लिया,
आज़ादी के सपने बुने।

दर्द सहे,
कोड़े पड़े,
हाथों से हाथ जकड़े हुए,
तन दिए,
सपने लिए,
पर मन नहीं टूटने दिए।
स्वर दिए,
विश्वास लिए,
कूद पड़े समर्पण लिए,
आज़ादी के मंत्र लिए,
काँटों पर वे चल पड़े।

धर्म किए,
अर्पण किए,
देश के चरणों तले,
काँटों पर हँसकर चले,
मन में यह विश्वास लिए।
मिलेगी आज़ादी जीने को,
मन से गुलामी हटाने को,
स्वर दिए,
स्वरूप बने,
बना चौराहा चल पड़े।

थी गर्मी उन खूनों में,
साँस दिए मंसूबों से,
कर्म किए,
भाव लिए,
हाथ मिले वो स्वप्न लिए।
भारत माँ की गोद तले,
सुकून भरी वो नींद मिले,
दौड़ पड़े वे शोलों पर,
परवाह नहीं अपने पैरों की।

नशा था उन अंग्रेजों पर,
देश से दूर भगाने का,
प्राण आहुति कर डाले,
साँस रुकी पर डिगे नहीं।
खूब मचाए शोले थे,
तब चैन की नींद वे सोए थे।

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