अपनी धुन में जीता हूँ। Poem by Rajnish Rajan

अपनी धुन में जीता हूँ।

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मैं दीवाना, मस्तमौला, अपनी धुन में जीता हूँ,
प्रेम-रस है अपना ही यह, मैं तो इसको पीता हूँ।

जी रहा हूँ अपनों में मैं, मस्त-मगन ही रहता हूँ,
इस दुनिया की फ़िक्र नहीं, इस दुनिया में ही रहता हूँ।

मैं भी उसका प्रेम-दीवाना, वह भी मेरी दीवानी है,
धड़कन के संग धड़कन चलती, अपनी यही कहानी है।

प्रेम-रस का नशा है ऐसा, हर कोई दीवाना है,
जो डूबा इस प्रेम-रस में, वही सच्चा रसिक सयाना है।

मैं भूला-बिसरा सा पागल, दुनिया पागल कहती है,
हँसता रहता प्यार में पागल, रोने की क्या हस्ती है।

तू भी जी ले प्यार में, जी ले, प्यार बड़ा अलबेला है,
हँस जाएगा रोता चेहरा, यह प्यार गज़ब निराला है।

मस्त-मगन हो जी ले जीवन, ज़िंदगी फिर न आनी है,
किसने देखा स्वर्ग-नरक को, ज़िंदगी एक बार पाई है।

बात-बात में, रात-रात भर, प्रेम-दीवाना जीता हूँ,
राह कठिन हो, राह में रोड़ा, तनिक नहीं घबराता हूँ।

मैं भी जीऊँ, वह भी जीए, यह बात समझ में आती है,
हँसता और हँसाता हूँ मैं, यह प्रेम-दीवाना जीता है।

प्रेम में जी ले, प्रेम में मर ले, प्रेम में ही तो जीवन है,
घाट-घाट, हर एक प्यासे को, मैंने तड़पते पाया है।

प्यार तू कर ले, प्यार में जी ले, यही तो सच्चा गहना है,
प्यार जो करना सीख गया वह, सच्चा रसिक दीवाना है।

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