।। न सीखी हमने कोई कैसी भी होशियारी ।। Poem by Rajnish Rajan

।। न सीखी हमने कोई कैसी भी होशियारी ।।

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सीखी है हमने तेरी केवल आँखों से यारी,
न सीखी हमने कोई कैसी भी होशियारी।

चलता-फिरता तेरा आशिक़ हूँ मैं,
तेरी ज़ुल्फें हैं घनेरी।
तेरी निगाहों ने मेरी तबीयत और
होश जब से गँवाई।

याद आई तेरी, तू तो अब
सांसों में है समायी।
घोर घटा छाई है जैसे,
मेरी आँखों में रुसवाई,
न सीखी हमने कोई कैसी भी होशियारी।

दुनिया की हस्ती में, तेरी सूरत मैंने जानी,
न सीखी हमने कोई कैसी भी चालाकी।

रब जब तेरी याद दिलाए,
होती ना फिर कोई ज़ुबानी।
आँखों से बहता है आँसू,
बहती तेरी रवानी।

यार वफ़ा सब मैंने माना,
ना की कोई मनमानी।
जीना है मुझको, अगर मिल जाए तेरी यारी,
न सीखी हमने कोई कैसी भी होशियारी।

प्यार में तेरी बातों को, बस वफ़ा ही मैंने मानी,
यार वफ़ा की रस्मों में, मैंने की न कोई नादानी।

मेरी धड़कन की चतुराई होगी,
ना कि मैंने कोई नादानी।
माना कि थी मुझको तुमसे यारी,
मैंने की ना कोई होशियारी।

तूने प्यार सिखाया मुझको,
जीना मुझे सिखाया है।
कैसे जियूँ मैं तेरे बिन,
इश्क़ में मिट जाना मुझे सिखाया है।

सीखी है हमने तेरी केवल आँखों से यारी,
न सीखी हमने कोई कैसी भी होशियारी।
© रजनीश राजन

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