वो रातें Poem by Rajnish Rajan

वो रातें

सिसकती हुई रात, याद आती है,
वही टीस दिल को, सता जाती है।
रातें थीं पर था, अँधेरा नहीं,
वहाँ पर था बस, वास तेरा वही।
गुलाबों सी तुम भी, वहाँ पास थीं,
सिसकती हुई रात, बहुत खास थीं॥

बदलते हैं करवट, सताती है रात,
वो पल-पल की बातें, वो बीती जो बात।
किया होगा महसूस, तुमने भी दर्द,
हुए हैं जुदा हम, हुए रिश्ते सर्द।
अँधेरा न था पर, चमक थी तुम्हारी,
सताती है अब, याद की बेकरारी॥

वो बातों की धीमी, मधुर सरसराहट,
अँधेरे में बिखरी, वो कोमल सी आहट।
झकझोरती होंगी, रातें तुम्हें भी,
जो यादों में आती, हैं अब भी कभी।
हँसी की वो किरणें, जो फैलातीं प्रकाश,
अँधेरी उन रातों, में होता उजास॥

नयन दीप जैसे, रचे जो खुदा ने,
सजाए हों जैसे, किसी भी ख़ुदा ने।
सितारे भी फीके, पड़े थे वहाँ पर,
अदाएं तुम्हारी, थीं जादू के स्तर।
वो अल्हड़ सी बातें, वो प्यारा सा साथ,
भुलाऊँ मैं कैसे, वो सावन की रात॥

मचलती ही होगी, तुम भी अब वहाँ,
वो साँसों की गर्मी, वो प्यारा जहाँ।
किया जो था साझा, वो लम्हा हसीन,
सजी थी जहाँ पर, ये यादें रंगीन।
उजियारे वाली, उन रातों का मोल,
हृदय में है अब भी, बना अनमोल॥

बसी है हृदय में, वही एक तस्वीर,
भले ही बदल सी, गई है तक़दीर।
मिलेंगे कभी जब, हम फिर से कहीं,
उजाले को ढूँढेंगे, फिर से वहीं।
अँधेरों के पार, एक ज्योति जगेगी,
वही रात फिर से, हमें अपनी लगेगी॥

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