'मंज़िल की संधान-क्षुधा में,
राही निज पथ भूल गया;
पाने की अंधी चाहत में,
वो जीवन का रस भूल गया।'
होश गंवा बैठा है जीवन,
यह तो गतिमय एक नियति है;
बेलगाम, बे-ब्रेक दौड़ती,
अंत काल की मौन घड़ी है।
पीड़ित न हो कोई हमसे,
हम सुदृढ़ पथिक बनना भूल गए;
पर-पीडन से मुक्त रहे मन,
परहित पावन सत्कर्म रहे।
प्रतिशोध की अंधी ज्वाला में,
हम निज अस्तित्व जला बैठे;
करुणा, क्षमा को त्याग यहाँ,
हम घृणा का पाश बढ़ा बैठे।
ताक पर रखे सकल सम्बंध,
भ्रम को ही स्वाधीनता माना;
अपनों को ही पराया समझा,
गैरों में निज रूप पहचाना।
आपाधापी के इस युग में,
क्या अवशिष्ट यही परिभाषा?
चैन-सुकून सब विलीन हुआ,
वैभव की अंधी अभिलाषा!
मन की तृष्णा,
मिथ्या आडंबर,
अगणित प्रपंच के छलावे हैं;
भीतर पूर्ण शून्यता का डेरा,
बाहर वैभव के दिखावे हैं।
कण-कण में असत्य का डेरा,
अब झूठ भी सहम कर जीता है;
जब असत्य ही सत्य बन जाए,
तब देख न्याय भी अश्रु पीता है!
औरों को जो आतंकित करते,
स्वयं को कहाँ संभाल पाते हैं?
कोई यहाँ संहार का भागी,
कोई अकाल काल को पाते हैं।
बेलगाम क्यों दौड़ रहे हो?
कुछ तो इसका अर्थ कहो!
जीवन जीना कठिन नहीं है,
सार्थक कर सत्कर्म रहो।
काल चक्र का अविरल पहिया,
सबको नित प्रति बोध कराता;
आज यहाँ जो मुकुटधारी है,
कल वो रेणु में मिल जाता।
कौन यहाँ आत्मीय हमारा?
कौन यहाँ पर मात्र पराया?
मृत्तिका का पुतला है केवल,
यही सृष्टि की शाश्वत माया।
ईश्वर,
आत्मा,
अंतस-चेतना,
विकल सुन रही सबकी व्यथा;
यह जीवन क्या?
मात्र सत्य का,
अविरल बहती अमर कथा।
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