॥ मैंने दिल को हज़ारों बार सिला ॥ Poem by Rajnish Rajan

॥ मैंने दिल को हज़ारों बार सिला ॥

यादें ताज़ा, दिल भी रूठा;
आँखें बंजर, हर शाम अधूरा।
बिन आँसू के, बहती धारा;
मैंने दिल को हज़ारों बार सिला।

सिल रहा हूँ दिल को बरसों से,
वो यादें उनकी दिल में अरसों से;
छलनी-छलनी करती फरसों से।
मेरी आँखों में शोला बरसों से।

मेरी दोनों आँखें बंजर हो गई हैं,
यादें फिर भी ताज़ा हो रही हैं।

आँसू बरसकर कब की सूखी?
मैंने दिल को हज़ारों बार सिला।

यादें कटीली, आँखों में चुभती—
जानो मरुभूमि का बादल कैसा।

मैंने मन-कीर्तन से गुंजन कर नूतन,
उसकी श्याम-छवि मैं खो ना सका।
यादें कटीली, दिल हर दिन ज़ख्मी;
हाँ, मैंने दिल को हज़ारों बार सिला।

यादों की हरियाली, बंजर शाखा,
उनकी बातें—सुई-सी चुभती यादें;
दर्द में सिलती दिल और धड़कन।
हाँ, मैंने दिल को हज़ारों बार सिला।

यादों के बोझ तले दबता जा रहा हूँ...
गिला हिमाकत नहीं मेरी कि,
उससे मैं अब रूबरू हो पाऊँ।

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