छोड़ गई वो बीच भंवर में,
कई नगमे अभी अधूरे थे।
मैं फिरता पागल यूँ ही,
अँधियारी गलियों में।
नशा अधूरा लगता है,
चैन कहाँ अब मिलता है।
यादों के पल-पल भंवर में,
कहाँ कोई ठिकाना मिलता है।
तड़प तड़प के जी रहा मैं,
गली गली में खोज रहा मैं।
अब आस अधूरी लगती है,
साँसों का ही छूटना बाकी है।
मयखाने में मैं पड़ा हुआ,
शराब भी पूछे क्या हुआ।
अश्क सब बयां कर देता है,
चैन कहाँ मिल पाता है।
घर की दहलीज पूछे,
खोया-खोया सा रहते हो।
पैर कहाँ टिकता अब घर में,
भटका-भटका सा रहते हो।
अब नब्ज़ ही सुई चुभोती है
ये वक्त-वक्त की बातें हैं।
गैरों से अब क्या शिकायत,
जब नब्ज़ ही सुई चुभोती है।
गिरते पिंडों से उसको माँगा था,
अजब का साथी था वो मेरा।
टूटता तारा भी धोखा दे गया,
मेरी चाँद को मुझ तक ला न सका।
उम्मीद-ए-वफ़ा में ज़िंदा था,
वो भी धुंध में मिट सी रही।
हाथ जोड़कर माँगा था,
वो पीठ दिखाकर सिमट गई।
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