।। हिज़्र का ग्रहण ।। Poem by Rajnish Rajan

।। हिज़्र का ग्रहण ।।

यादों की तरंगों में, खिलता एक गुलाब सा चेहरा,
रुमानी इश्क़ की छनक, से रोशन मन का सवेरा।
हँसती थी तो हस्ती थी—वो एक चाँद का टुकड़ा,
वो बादल की थी बेईमानी... जिसने चाँद को घेरा।

बादल दर्द क्या समझे, जो बेदर्द हर बात पे बरसे,
गरजते बादल की वो बातें, बरवक्त बरस नहीं सकती।
कड़कती है घटा तो क्या? हम आशिक नहीं डरते,
बिखरती बिजलियों की धार—से होगी प्रेम की बौछार।

अब ठहरी सी वो दिखती है, उदासी मन में ठहरी है,
कसक है प्यार में ऐसी-----ज़ुबाँ पे अब पहरेदारी है।
उदासी आँखों में दिखती है, रुसवा-ए-हिज्र होता हूँ,
अक्स-ए-सनम है उनका, ये जवानी बदनाम रोती है।

नहीं मैं रह नहीं सकता, हाँ वो भी जी नहीं सकती,
अधूरा ख्वाब लगता है, ग्रहण का स्याह अंधेरा हो जैसे।
यहाँ एहसास मौन बैठे हैं, मौन में मेरा प्यार तड़पा है,
वो बादल की थी बेईमानी... उसने मेरे चाँद को घेरा।

मैं साँसों में महकता था, मेरी साँसें बहकती हैं,
दूरी कदमों की थी हममें, पर साँसें साथ चलती थीं।
अब वो दूर बैठी है, अब साँसें साथ नहीं चलतीं,
वो बादल की थी बेईमानी... अब आँखें बरसती हैं।

वो बादल की मनमानी से, हमारा चैन उजड़ा है,
आज़ादी के दौर में हमको, बादल ने तड़पाया है।
बरस जाओ तुम ऐ बादल, मंडराना है तो मंडरा लो,
तेरी आज़ादी की बातें, बरवक्त बरस नहीं सकती।

बिजलियां तोड़ जाएंगी, छटक कर तुम टूट जाओगे,
अभी भी वक्त है प्यारे, मंडरा कर दूर जाओ तुम।
चाँद को मैं मना लूंगा, वो मेरी मजबूरी समझेगी,
बिखरती बिजलियों की धार—से होगी प्रेम की बौछार।

© रजनीश राजन ✍️

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