मद-मुद्रा में मैं आऊँ उससे पहले, तुमको साँसों में भर लूँ,
साँसों में भरकर तुम्हें, आलिंगन करूँ, मदिरालय में जाऊँ,
मदमाता मैं मदिरालय में, तेरी चाहत से मदहोशी ना छाए,
तू साकी, तेरा होठ ही प्याला, मदिरालय में बस जाने वाला।
मदमस्त नहीं मधुशाला में, मदमाता जब तेरे होठों से पीता,
मैं मदिरालय में बस जाने वाला, तू साकी, तू ही मधुशाला,
मख़मूर सरशारी साग़र ना ढूँढता, सुराही गर्दन से मय पाता,
तेरे होठों से पीता, मैं मदमाता, मदिरालय में बस जाने वाला।
मादकता से मैं गर मदमाता, मदहोशी में सारा मधुशाला पीता,
हाँ मद-मंथन कर मैं चाहत-परस्त, मैं लब-ए-जाम पीने वाला,
तेरी आँखें प्याली, तू मधुशाला, मैं मदमाता, तू मेरी नूर-ए-हाला,
अधर-सुधा मैं पीने वाला, हाँ मैं तेरे चित्त-भ्रम में जीने वाला,
तेरी साँस सुराही, तू ही मधुशाला, मदिरालय में बस जाने वाला।
हाँ मधुमय प्याले से छलकता, मैं मृग-छौनी चाल से मदमाता,
लावण्य-मद मैं पीने वाला, तो क्या मदिरालय, क्या मधुशाला,
मद-विभोर मैं अंतर्मन से, मद-सिक्त आलिंगन-पाश तुम्हारा,
तेरी दृष्टि जाम, हृदय मधुशाला, मदिरालय में बस जाने वाला।
रोम-हर्षण से मद-मूर्छित होता, तुममें चित्त-विश्राम मैं पाता,
तेरे नयन-कोर से मैं पीने वाला, मदमाता प्राण-सुधा मैं पीता,
मेरी अंग-राग तू मद-मंजरी, तुममें ही मद-मरीचिका मैं पाता,
मधुशाला में गर मदमाता, मदहोशी में सारा मधुशाला पीता,
हाँ दृष्टि कौमुदी मैं जीने वाला, मदिरालय में बस जाने वाला।
सजदा-ए-साकी तेरी मदहोशी में, अदृश्य जाम मैं पीता हूँ,
तू ही मधुशाला, मदिरालय में जाकर, मदिरा अधर ना छूता हूँ,
मैं कर-लकीर से पीने वाला, तो क्या मदिरालय क्या मधुशाला,
तेरा देह लतिका, मद गंधा है, तू मदिरालय तू ही मेरी मधुशाला
तू मद-कलश है तू मद-मयी, मैं मदिरालय में बस जाने वाला।
© रजनीश राजन ✍️
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