तेरी खुशबू से तुझको ढूंढता, मदिरालय से मैं गुज़रने वाला;
मैं पीने वाला, मय की गंध से मदिरालय में न जाने वाला।
मदमाता मैं बस तेरी छुअन से, मैं साकी पर मर मिटने वाला;
अधर रसीला, तू मेरी हाला, तेरे होठों से रस मैं पीने वाला ।
तू मदभरी मेरी मधुशाला, मैं बस मदिरालय में जाने वाला ॥
मद-मुद्रा में मैं आऊँ उससे पहले, तुमको साँसों में भर लूँ;
साँसों में भरकर तुम्हें, आलिंगन करूँ—मदिरालय में जाऊँ।
मदमाता मैं तेरी चाहत से, मदिरालय में मदहोशी ना छाए;
तू साकी, तेरा अधर ही प्याला, बस मदिरालय में जाने वाला ॥
मदमस्त नहीं मधुशाला में, मदमाता जब तेरे अधरों से पीता;
मैं मदिरालय में बस जाने वाला—तू साकी, तू ही मधुशाला।
मख़मूर सरशारी साग़र ना ढूँढता, सुराही-गर्दन से मय पाता;
तेरे अधरों से पीता मैं मदमाता, बस मदिरालय में जाने वाला ॥
तुम मैकश, तू ही मधुपाया, इस दिल की प्यास बुझाने वाली;
तुम पलकों से मद-नयन को, हयापरस्त तुम करने वाली।
तेरी नयन-मधुशाला में मदमाता, मय अधर से न छूने वाला;
मैकदे से पीता मैं मदमाता, बस मदिरालय में जाने वाला ॥
मादकता से मैं गर मदमाता, मदहोशी में सारा मधुशाला पीता;
मद-मंथन कर चाहत-परस्त, मैं लब-ए-जाम पीने वाला।
तेरी आँखें प्याली, तू मधुशाला, मैं मदमाता—तू मेरी नूर-ए-हाला;
अधर-सुधा मैं पीने वाला, हाँ, मैं तेरे चित्त-भ्रम में जीने वाला;
तेरी साँस सुराही, तू ही मधुशाला, बस मदिरालय में जाने वाला ॥
मधुमय प्याले से छलकता, मैं मृग-छौने सी चाल से मदमाता;
लावण्य-मद मैं पीने वाला, तो क्या मदिरालय, क्या मधुशाला?
मद-विभोर मैं अंतर्मन से, मद-सिक्त आलिंगन-पाश तुम्हारा;
तेरी दृष्टि जाम, हृदय मधुशाला, बस मदिरालय में जाने वाला ॥
रोम-हर्षण से मद-मूर्छित होता, तुममें चित्त-विश्राम मैं पाता;
तेरे नयन-कोर से मैं पीने वाला, मदमाता प्राण-सुधा मैं पीता।
मेरी अंग-राग तू मद-मंजरी, तुममें ही मद-मरीचिका मैं पाता;
मधुशाला में गर मदमाता, मदहोशी में सारा मधुशाला पीता;
हाँ, दृष्टि-कौमुदी में जीने वाला, बस मदिरालय में जाने वाला ॥
सजदा-ए-साकी तेरी मदहोशी में, अदृश्य जाम मैं पीता हूँ;
तू ही मधुशाला, मदिरालय में जाकर मदिरा-अधर ना छूता हूँ।
मैं कर-लकीर से पीने वाला, तो क्या मदिरालय, क्या मधुशाला?
तेरी देह-लतिका मदगंधा है; तू मदिरालय, तू ही मेरी मधुशाला।
तू मद-कलश है, तू मदमयी, बस मदिरालय में जाने वाला ॥
अक्स गुलाबी, आँखें शराबी, मैं स्वयं को तुझमें घोलने वाला;
तेरी पायल रिमझिम मख़मूरी, मैं उस मय में मय होने वाला;
जब आहट मय, तेरी चाहत मय, मैं रोम-रोम से झूमने वाला;
तेरा बदन सुराही, तू मधुशाला, बस मदिरालय में जाने वाला ॥
गेसुओं के सागर में हमने, साग़र-ए-इश्क ना बदनाम किया;
जब भी पिया होठों से पिया, तेरी जुल्फों के साये में पीने वाला।
अहसासों में साग़र ना घोला, अहसासों की प्याली पीने वाला;
मैंने साग़र ना बदनाम किया, बस मैं मदिरालय में जाने वाला ।।
अमृत से भी मधुर हैं शायद, तेरे होंठों की रस भरी हाला,
जब आत्म सुकून तेरी बोली में, कौन जाए फिर मधुशाला।
क्षणिक सुकून मिल जाए जहाँ पर, वो लोगों की मधुशाला,
अधर सुधा मैं पीने वाला, तुममें अनंत तृप्ति मैं पाने वाला।
तेरी अनंत रोशनी से भड़के, वो मधुशाला की फीकी हाला,
जब आँखों में हाला पाला, तेरी आँखें प्याली, होंठ हैं प्याला।
तू ही साकी, मेरी मधुशाला, बस उस मदिरालय में जाने वाला।
तेरी अंजलि की तन्मयता में, प्रेम-मकरंद मैं पीने वाला,
तेरी रिक्त अंजलि की हाला, अमीय छाप वो छोड़ने वाला।
मैं मधुप सुरशारी का राही, तेरे कर-कमल ही मधुशाला,
तेरी काया की कोमलता से, बस मदहोशी में खोने वाला।
तेरी सांसों की परिमल में, मैं मौन सिहरन को जीने वाला,
मैं उस मदिरालय जाकर, क्षणिक मदहोशी को सोचने वाला।
तेरी आलिंगन से सिहरन मैं पाता, चंचल अधरों से पीने वाला,
तुममें ही तुमसे जीने वाला, मैं बस मदिरालय में जाने वाला।
© रजनीश राजन ✍️
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