खूब है वो, खुश है वो
मुझसे बिछड़कर,
दूर है वो।
हाँ, जला है दिल मेरा,
मैं दिलजला हूँ,
परेशान हूँ,
मैं दिलजला,
एक रोग हूँ।
गीत मेरा, उसकी वजह है,
मैंने लिखा जो,
उसकी कसम है।
भूलना ना तुम कभी,
कहती थी वो—
ये उसकी बातें,
उसकी कसम हैं।
कसमें खाई थीं दोनों ने,
जुदाई मुझको नसीब हुई,
वो महलों की रानी हुई,
मैं भूला-बिसरा रोग हुआ।
कसमें निभाऊँ
या मर जाऊँ?
कसमों को अब
कितना निभाऊँ?
कसमें उसे अब
याद नहीं हैं,
महलों में वो खुश रहती है,
मैं रोग हूँ,
एक बिखरा सा अब।
एक लाचारी में बसा मैं,
पल-पल मरता रहता हूँ,
मेरी कसम का क्या हुआ जो—
उसने मेरे माथे खाई थी?
गर कसम निभाती वो भी ज़रा सी,
मैं भी थोड़ा जी लेता,
भूल गई वो सब कसमें-वादे,
मैं अब पल-पल मरता रहता हूँ।
चाँद वही है, रात वही है,
बस तक़दीरें बदल गई हैं,
जो धूप कभी हम दोनों की थी,
वो महलों की छाँव में है अब,
और वो धूप मुझपे कहर बनी है।
माना कि तुम महलों की हो,
पर इस अधूरी मौत की,
तुम आखरी कहानी हो।
जब टूटेगी ये साँस तो,
एक बार दूर से ही सही,
देख लेना, इस रोग को।
मैंने सौंप दिया सब वक़्त को अब,
न गिला है कोई,
न मलाल रहा,
वो जीत गई अपने हिस्से का,
मैं हार के बस एक रोग हुआ।
मैं कसम निभाऊँगा मरकर भी,
तुम महलों में आबाद रहो,
मेरा घर जला है,
अब मैं भी जलूँगा,
तुम महलों की आवाज़ बनो।
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