शांत हवा में शोर है बिखरा,
मन का वो अभिमान पिघलकर,
बन बह रहा वो नीर नदी का;
बैठ किनारे मीन को देखा,
छटपट-छटपट मीन है प्यासी।
किसने कहा कि शोर नहीं है?
मन में उथल-पुथल मची है,
शोर हिलोरे मार रहा है;
मन को कैसे शांत करूँ मैं?
बात अकेले जीने की है,
या बात साथ में जीने की हो;
शांत कहाँ कब होता है कोई?
मन भटकता रहता है,
शांत हवा सुलगती रहती है।
घाट-घाट पर, बात-बात पर,
मन मन से लड़ाई करता है;
जब मन मन से क्षुब्ध हो जाता है,
तब मन मस्तिष्क से लड़ाई करता है।
हे नीर के वीरों, मीन अभिमानी!
धारा देखूँ शांत है कल-कल;
भटक रही है मीन तू हर पल,
क्यों तलाश तुम्हारी कितनी गहरी है?
मौन अभिलाषा जी लो तुम,
हे नीर के वीरों, शांत रहो तुम।
उम्मीद कहाँ, किससे है पाला?
उम्मीद खरा सोना क्या सच्चा?
तलाश कहाँ, किसकी पूरी?
उम्मीद अपेक्षित रहती है;
बस बातें ही अच्छी होती हैं,
हाँ, उम्मीद अधूरी होती है।
चाल माल का, प्यार उधार का,
कौन कहाँ कब समझा है?
ठोकर खाता मुँहभर गिरता,
तब बात समझ में आती है।
बात घाट की, सुबह शमशान की,
कितना! शांत चितवन सब जीता है,
मरकर अर्थी जब ज्वाला धधकती,
ज्वाला भी शांत सुलगती जलती है;
क्यों जलूँ मैं? हलचल में जियूँ मैं?
अब मन का शोर शांत मैं करता हूँ।
मन का, तन का, खुद ही जानो,
शोर-मन चितवन को समझो;
किससे, कहाँ, क्यों लड़ता जाऊँ मैं?
मन शांत नहीं, मैं लड़ रहा हूँ,
अपने मन को शांत कर रहा हूँ।
मैं तट पर बैठा केवल द्रष्टा हूँ,
न धधकती ज्वाला की भाषा हूँ;
उड़ता-बहकता मन है जो अपना,
हाँ, शांत-सुमन मैं करता हूँ।
दिखता, हार-जीत के पार जो शून्य है,
हाँ-हाँ, वो ही मेरा असली घर है।
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