मानव आज भी सुशुप्त है। Poem by ramesh rai

मानव आज भी सुशुप्त है।

आज भी है मानव सुशुप्त
नहीं पता है गंतव्य कहां।
नहीं पता है अपनी मंज़िल
नहीं पता है अपनी डगर।।

मानव आज भी सुशुप्त है
कोटि कोटि प्रयत्नों के बाद।
मानव आज भी भटक रहा
मानव आज भी चित्कार रहा।।

शांति की खोज में कितने युग बीत गए
शांति की खोज में कितने युग पुरुष आए।
कितने युग पुरुष आए फिर चले गए
लेकिन मानव आज भी कराह रहा ।।
Created on 18/9-19/9/ 2025
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@ Ramesh Rai

Wednesday, March 18, 2026
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