चांद के आंगन में। Poem by ramesh rai

चांद के आंगन में।

चांद के आंगन में
जश्न मना है मानव का।
हर जीवन मुस्कान बनी है
एक नई उर्जा को लेकर।।

मन्द मन्द हवाओं से
बहती है निश्छल धारा।
शुरु हुआ एक नए सोपान का
तरंगित होती नभ सारा।।

तुम हो युग के प्रहरी
दसों दिशाओं की आभा बिन्दु।
सप्त रंगों से सजी प्रकृति
उतरी आज चांद धरा पर।।

Created on 8/9-18/9 2025
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@ Ramesh Rai

Tuesday, March 17, 2026
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