जब सो गई चांदनी। Poem by ramesh rai

जब सो गई चांदनी।

जब सो गई चांदनी
बिखर गया चंद्रमा
बिखर गए तारे सभी
नभ बना तारों रहित।

चंद्रमा की चांदनी
आज क्यूं सो गई
विभावरी भी आज
शून्य में खो गई।

है कहां वह चांदनी
है कहां वह विभावरी
है कहां नभ का प्रियतमा
है कहां रजनी प्रभा।

विलीन हो गए सभी
विलीन हो गया आसमा ।

Created on 21/9/2025
All rights reserved
@ Ramesh Rai

Tuesday, March 24, 2026
Topic(s) of this poem: rights
COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
ramesh rai

ramesh rai

howrah
Close
Error Success