बाहर की बात Poem by Sankhajit Bhattacharjee

बाहर की बात

बाहर की बात जो बाहर रखता और घर की बात घर में, वह ज्ञानी।

समाज पथभ्रष्ट करता है और घर दिखाता है सही दिशा, युग की वाणी।

===============================================

बाहर की बात जो घर में लाता और घर की बात को बाहर ले जाता, वह गुणी।

समाज समय पर शिक्षा देता है और बंद घर सोच को छीन लेता है, नियति की वाणी।
================================================
Good Read! Here is a gift for you.

COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success