सोचना Poem by Sankhajit Bhattacharjee

सोचना

जो मैं सोचता हूँ,
वह कभी नहीं होता;
जो मैं सोचता नहीं हूँ,
वह भी कभी नहीं होता।

इसलिए मैं सोचना बंद कर दिया!
कैसे?
जब मन भटकता है,
तब मैं आँखें बंद करके सो जाता हूँ।
जब मैं सपने देखता हूँ,
तब मैं नींद से जाग जाता हूँ।

इससे मुझे क्या मिला!
सोना मुझे बताया,
'मन की बात न सुनकर सुनो दिल की बात'।
सपनों ने मुझे बताया,
'हमेशा हृदय से पूछना दिमाग का पता'।

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