पब्लिक (जनता) Poem by Sankhajit Bhattacharjee

पब्लिक (जनता)

पब्लिक को कुछ सिखाना मत-

पब्लिक हम लोगों से भी

ज्यादा जानती है।



मैं एक चीज़ विश्वास करता हूँ-

जानता से जनता जन्म ली है।

मैं सब कुछ जानता हूँ

और मैं जनता हूँ-

दोनों लगभग एक ही होते हैं।



अगर पब्लिक आपके पीछे ली

तो आप पब्लिक से निकल कर,

रिपब्लिक (गणराज्य) से निकल कर,

मौत की ओर भागेंगे।



रिपब्लिक में रहने के लिए

पब्लिक को कुछ मत सिखाना।

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