पहाड़ से नदी निकलती है और मिलती है सागर में।
पत्थर गतिरोधक, नदी जीवन की गति और समुद्र नियति है।
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ये साफ सफाई की बात नहीं, कोरोना ने लिखा खत।
इधर उधर थूकना मत।
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गंगा की गोद में चलती है नाव, मृत शरीर भी।
समय की गोद में खिलती है सभ्यता और जंगली जानवर का अंधा विश्वास भी।
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बचपन मासूम कली।
फल बनना और बड़ा होना- काला दाग में अशुद्ध कलि।
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कीचड़ में भी कमल खिलता है।
अच्छे घर में भी बिगड़ा हुआ बच्चा पैदा होता है।
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इंसान का अकाल नहीं, इंसानियत का अकाल है।
डॉक्टर (सेवा) का अकाल नहीं, वैक्सीन (व्यवस्था) का अकाल है।
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कुत्ते समझते हैं कि कौन इंसान और कौन जानवर है।
वे इंसान को देख कर पूंछ हिलाते हैं और जानवर को देख कर भूँकते हैं।
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जीविका से प्यारा है जिंदगी।
अगर साँस बंद है, तो कैसे समझेंगे रोटी की कमी।
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