काश मेरा भी... Poem by Swati Sharma

काश मेरा भी...

आज जब मैं
इन छोटे-छोटे बच्चों को
साथ जुड़े में बैठे देखती हूँ…
साल-दर-साल
एक ही वही जोड़ा बार-बार देखती हूँ—
कभी लाइब्रेरी में,
कभी क्लासरूम में,
कभी कॉरिडोर में…
तो सोचकर
मन उदास-सा हो जाता है…
कि काश मेरा भी जोड़ा ऐसे ही रहता,
काश मेरा भी जोड़ा कभी न टूटा होता…
मेरा भी प्यार ऐसे
बचपन में खेल कर जवान हुआ होता…
काश…!
फिर चल पड़ती हूँ आगे
उन बच्चों से सलाम लेकर…
कदम मेरे तेज हो जाते हैं,
पर धड़कन कम-सी हो जाती है…
प्यार भरे जोड़े…
पूरे कॉलेज में—
कुछ पुराने,
कुछ बस दो दिन नए…
बचपन का प्यार।
~स्वाती 🦋

काश मेरा भी...
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