माना कि हम पूरे नहीं, पर उतने भी अधूरे नहीं।
माना कि शरीर की बनावट में हमारे, थोड़ी सी कमी है
शायद चलने में थोड़ी सी रफ़्तार भी थमी है,
पर ग़ौर से देखो हमारे हौसले की उड़ान को,
इसमें ना कोई थकान है, ना आंखों में नमी है।
माना कि हम पूरे नहीं, पर उतने भी अधूरे नहीं।
तुम नापते हो कदमों से रास्ते, हम इरादों से नापते हैं,
मुश्किलें जब हमारे सामने आती हैं, तो हम नहीं, मुश्किलें कांपती हैं।
अगर पैरों में जान नहीं है, तो क्या हुआ।
हम मन के पंखों से आसमान नापेंगे।
हमारे पास बैसाखियां हैं, पर अपनी सोच से हम तुमसे भी तेज भागेंगे।
माना कि हम पूरे नहीं, पर उतने भी अधूरे नहीं।
हमें दया की नज़रों से मत देखो, हमें तुम्हारे साथ की ज़रूरत है।
हमें करुणा नहीं, बस बराबरी का ही इंतज़ार है।
जो आंखें देख नहीं सकतीं, वह दिल से महसूस करते हैं,
जो ज़ुबां बोल नहीं सकती, वो जज़्बातों से खुद को बयाँ करती है।
ईश्वर की बनाई इस दुनिया से हमारी कोई दूरी नहीं
माना कि हम पूरे नहीं, पर उतने भी अधूरे नहीं।
हर चुनौती को हमने एक अवसर बनाया है।
गिरकर संभलना, दुनिया को हमने सिखाया है।
हम वो हैं जो पत्थर में भी रास्ता बना लें,
अंधेरे में भी उम्मीद का दिया जला लें।
हमारी कामयाबी के लिए तुम्हारी हमदर्दी जरूरी नहीं।
माना कि हम पूरे नहीं, पर उतने भी अधूरे नहीं।
उतने भी अधूरे नहीं।
~ डॉ. आनंद कौशल
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