S.D. TIWARI

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Urmila Ka Virah (Hindi Ghazal) उर्मिला का विरह - Poem by S.D. TIWARI

उर्मिला का विरह

बिछुड़ सजन से अपन, घबराने लगी
उर्मिला मन ही मन, अकुलाने लगी।
वन गमन को लखन, जब घर से चले
संग जाने को उनके, मनाने लगी।
साथ जाना सजन के, मना हो गया
सफल तप हो, स्वयं को तपाने लगी।
बीत चौदह बरस, जाँयगे किस तरह
सोचती रात ऑंखें, जगाने लगी।
देखती आसमां, अंगना में खड़ी
चांदनी में अकेले, नहाने लगी।
आस मन में लिये, फिर उगेगा रवी
घोर तम में लिये, दिल जलाने लगी।
दिन बिताती बिरह में, तपस्विनी बनी
लखन सकुशल रहें, नित मनाने लगी।

एस० डी० तिवारी

Topic(s) of this poem: hindi, sad


Comments about Urmila Ka Virah (Hindi Ghazal) उर्मिला का विरह by S.D. TIWARI

  • Rajnish Manga (1/31/2016 1:44:00 AM)


    You have really done well to devote this poem to the unsung character of Urmila, wife of Lakshman, in Ramayana, Her sentiments have been nicely captured. Thanks. (Report) Reply

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Poem Submitted: Saturday, January 30, 2016

Poem Edited: Friday, December 30, 2016


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