S.D. TIWARI

Freshman - 861 Points (December.1955 / India)

Muskan - Poem by S.D. TIWARI

गुजरिया जब इधर देखकर मुस्कराई
एक छबीली मुस्कान सामने से आई
जब दिल में झाँका और वह मुस्कराई
एक कटीली मुस्कान दिल में चुभाई

मैंने जब उसे दिल का दर्द दिखाया
उसने हठीली मुस्कान से भरमाया
और ईर्ष्यालु मित्र ने जब दर्द में देखा
तो देखकर उसने कुटील मुस्कान फेंका

मैंने भी मुस्कराकर ही दिया उत्तर
जटिल मुस्कान से दर्द को छुपाकर
शो रूम में जब सुंदर सेल्स गर्ल मिली
और नकली मुस्कान से मुझको छली

जब एक नन्हा सा बालक मुस्कराया
उसकी भोली भली मुस्कान ने लुभाया
गोदी में उठाकर चूम लिया गालों पर
सीधी सादी मुस्कान देखा माँ के होठों पर

कैसे होंठ से मुस्कराते हुए बीटा आया
और अपनी सफलता कि बात बताया
पडोसी कटाक्ष में मुस्कराया आधा ही
ऊपरी मन से बोला सफलता की बधाई

किसान लहलहाते खेत की और नज़र घुमाता
गर्व भरा दृढ और असली मुस्कान पाता
उम्दा फसल काटकर जब घर लाता
एक संतुष्टि भरा वह मुस्कान पाता

- एस डी तिवारी


Comments about Muskan by S.D. TIWARI

There is no comment submitted by members..



Read this poem in other languages

This poem has not been translated into any other language yet.

I would like to translate this poem »

word flags

What do you think this poem is about?



Poem Submitted: Tuesday, November 19, 2013

Poem Edited: Friday, December 6, 2013


[Hata Bildir]