कुदरत काओ कहर मैने देखा था
जीने के लिए लेते जहर मैने देखा था
दुनिया में रोज लाखों जीते मरते होंगे,
पर मौत की ओ बहती लहर मैंने दंखा था
...
नियति
जलने लगेगी कुछ ही पलो में
चिता पर रखी लाश
साथ ही
जलना होगा उस जूँ को भी
जो रहती आइ है उसके सर के बालों में
क्यों होगा यह क्रूर मजक उसके साथ
क्या जिन्दा रहकर उसने कोइ अपराध किया है
आदमी मरा है जूँ तो नही
क्यों जलेगी वो?
शायद बन्धी है जूँ शोषण के माया जाल में
इसीलिए वह भाग नही पाती
किसी ने रोका नही है उसे
जब तक जिन्दा था वह आदमी
जूँ ने खुब शोषण किया था उसका
दिन-रात
और आज भी शोषणरत है
जब वह मर चुका है
स्वार्थ में डूबा हर व्यक्ति
इसी अंजाम को प्राप्त करता है कि
वह किसी को खाता है तो कोइ
उसको खा जाता है
हर शोषण कर्ता की यही नियती है
अनिल कुमर सिन्हा "गुड्डू"