नियति Poem by Anil Kr Sinha

नियति

जलने लगेगी कुछ ही पलो में
चिता पर रखी लाश
साथ ही
जलना होगा उस जूँ को भी
जो रहती आइ है उसके सर के बालों में
क्यों होगा यह क्रूर मजक उसके साथ
क्या जिन्दा रहकर उसने कोइ अपराध किया है
आदमी मरा है जूँ तो नही
क्यों जलेगी वो?

शायद बन्धी है जूँ शोषण के माया जाल में
इसीलिए वह भाग नही पाती
किसी ने रोका नही है उसे
जब तक जिन्दा था वह आदमी
जूँ ने खुब शोषण किया था उसका
दिन-रात
और आज भी शोषणरत है
जब वह मर चुका है
स्वार्थ में डूबा हर व्यक्ति
इसी अंजाम को प्राप्त करता है कि
वह किसी को खाता है तो कोइ
उसको खा जाता है
हर शोषण कर्ता की यही नियती है

अनिल कुमर सिन्हा "गुड्डू"

COMMENTS OF THE POEM
Jazib Kamalvi 15 April 2019

Seems A good start with a nice poem, Anil. You may like to read my poem, Love And Iust. Thank you.

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