sanjay kumar maurya

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अकेली नहाती लड़की - Poem by sanjay kumar maurya

भीषण ग्रीष्म
धरती छूकर जलते पैर
बड़ी कठीनाई से पहुचता था
बिना चप्पलों के
तालाब के किनारे
उस पेड़ के नीचे ।
एक गौरैया गर्मी से बेहाल
किनारे पानी में
हो रही थी लोटपोट।
फिर पानी से बाहर रही थी फूदक ।
फरफरा रही थी पंख
झाड़ रही थी पांखों की बूंदें
अल्हड़ता के साथ
आसपास से अनभिग
व स्वयं में तल्लीन।
स्मरण हो आया वो अरसा अचानक
चक्र उस घटनाओ का
देखकर सहसा
तालाब में
अकेली नहाती लड़की
व झटक कर झाड़ती बालों से बूंदे ।

Topic(s) of this poem: girl


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Poem Submitted: Wednesday, September 2, 2015



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