sanjay kumar maurya

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मैं उड़ना चाहता हूँ - Poem by sanjay kumar maurya

उड़ना चाहता हूं अंबर में
मन की पाखों से
आस पास के वृक्षों पर बैठ
लचकती हिलती शाखों से ।

कि जैसे उड़तें हैं खग कुल
दूर दूर तक
लेकर आतें हैं दानें
चुन चुन कर चोंच में
खिलातें हैं मुंह में दानें
जिनकी पाखें उड़ना नहीं जानतीं
आॅखें बाहर की दुनियां नहीं देखीं
उन्हें बस आता है
चीं चीं का रट लगाना ।



रोज उड़ता है विमान
इस शहर से उस शहर को
और दिखा देता है बहुत कुछ
एक ही नजर में
बड़ा को छोटा करके
वह पर फैलाए चीरता है हवा
आसमान की ओर मुंह किए
कभी बादलों की उपर से
कभी बादलों के नींचे से
कभी बादलों को चीरकर
विमान की खिड़कियों से दिखता है
सफेद बादलों का उंचा नीचा पहाड़
या फिर कहे धुएं का अंबार
जब कभी सफेद बादल नहीं होते
तब नजर आता है उपर की ओर
दूर दूर फैला आसमानी रंग
स्वच्छ बेदाग आकाश
न्ींचे दिखतें है
कहीं कहीं बहुत वृहद नगर
बड़े बड़े भवन
बड़े बड़े पेड़
बिल्कुल छोटे से
दिखतें हैं मरुस्थल
कि मद्धिम लाल बिछा चटाई
दिखती हैं नदियां
कि जैसे बिछी हो सफेद मोटी रस्सी
दिखते हैं सड़क
जैसे काली रस्सी का विस्तार
जिस पर चलती हुई गाडि़यां
मालूम होती हैं रेंगती हुईं भिन्न -भिन्न
रंगों वाली असंख्य चिटियां
रात्रि में तो शहर में खचाखच बत्ती
सड़कों पे कतारों में जगमगाती बत्ती
या फिर कहीं एकान्त में सिर्फ अंधेरा
और उस अंधेरे में जलती एक बत्ती
वीराने में जलती किसी घर की दीया की तरह
झांकता है चांद खिड़की से
जहाज के भीतर
शायद इस उत्सुकता में
कि मानव कैसा लगता है
देखने में नजदीक से
जो पहले कर चुके हैं यात्रा
अक्सर वे ही बतलातें हैं इस बारे में ।





सुना हूं एक तय शुदा उंचाई पर
आदमी जब जाता है पहॅुच
फिर वह कभी पीछे मुड़कर नहीं आता
समय न मिलता होगा शायद
या दरवान निकलने न देतें होंगे बाहर दरवाजे से
या वायुमण्डल का प्रभाव होगा
जहां आदमी पहुंचकर
शिथिल व निष्कृय हो जाता है
पानी की बूंदे
या कोई वस्तु
या कि आदमी
या कुछ भी हो
सब तैरने लगते हैं वहां
गिरते नहीं हैं
गुरुत्वाकर्षण खत्म हो जाता है
ऐसा मैनें जब विधार्थी था तब पड़ा था
शायद विज्ञान वाले किताब में
अब खुद ही देखना चाहता हूं
अंबर को मन की आंखों से
अंबर में रहकर कुछ पल कुछ दिन।

मैं उड़ना चाहता हूं अंबर में
मन की पाखों से

चांद धरती की तरह है
गया था कोई घूमने वर्षों पहले
लाया था मिट्टी थोड़ी सी
वही कह रहा था वहां की हालात
बता रहा था गर्व से
कि हम धरती से जब देखतें हैं आकाश में
चाॅद को व उसके काले सफेद धब्बे
वाकई वो होतें हैं छोटे छोटे उंचे नींचे गढ्ढे
जिसे हमने पैरों से रौंदा
हाथों से छूआ और उछला कूदा
सैर सपाटे किया बहुत देर ।

तारों के साथ
व्यतीत करना चाहता हूं कुछ पल
सुना है अक्सर
वहां तक पहुंच नहीं बनाई किसी ने
या गोया बना ही नहीं पाई
मैं पहुंच जाता पहले
मैं तैरना चाहता हूं अन्तरिक्ष में
जैसे तैरते हैं उल्का
अकेले अकेले दूर तक
तारों के साथ लुका छिपी खेलते हुए ।


सुना है एलियन वहां रहते हैं
आदमी की तरह बात करते व सुनतें हैं
उनकी भी दुनियां है
उनके भी घर हैं
उनके पास वो सब है
जो हमारे पास है
या हमसे ज्यादा है उनके पास
वह भी उड़ते हैं
आतें हैं धरती देखने
फिर चले जाते है देख कर धरती
मैं भी देखना चाहता हूं उनकी धरती
उनका रहन सहन
उनकी संस्कृति व उनके देश को ।

मैं उड़ना चाहता हूं
केवल मन की पांखों से
क्योंकि मन उड़ता है
क्योंकि मन तीव्रगामी है
क्योंकि मन की पहुंच में सब है
क्योंकि मन की यात्रा सदैव सुरक्षित है
क्योंकि मन देखता भी है
क्योंकि मन अनुभव करता है
क्योंकि मन सच्चा व निस्वार्थ है
क्योंकि मन आईना है
क्योंकि मन झूठ नहीं बोलता।

Topic(s) of this poem: flight


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Poem Submitted: Friday, September 4, 2015



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