sanjay kumar maurya

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उसका बदन छूकर - Poem by sanjay kumar maurya

उसका बदन छूकर कोई बयार आएगा
फिर खामोश आॅखों में प्यार आएगा

ओ पराई चीज है उसे मत ही ले तू
बदनामी होगी अगर चैकीदार आएगा

यूं न देख आॅखों में आॅखें डालकर
उसने तीर छोड़ा तो दिल के पार आएगा

इतना जुल्म न करो ओ महलों वालों
हिसाब लेने मजलूमों का सरदार आएगा

जो जाहील है आवाम भी उसी की मुरीद है
जो पिछली बार लूटा वही सरकार आएगा

Topic(s) of this poem: poem


Comments about उसका बदन छूकर by sanjay kumar maurya

  • Rajnish Manga (9/5/2015 8:54:00 AM)


    आपकी इस बेहतरीन ग़ज़ल में प्रेम की सुंदर अभिव्यक्ति के साथ साथ कड़वा सामाजिक यथार्थ भी पाठक के सामने प्रगट होता है. आपकी लेखन शैली को सलाम. (Report) Reply

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Poem Submitted: Saturday, September 5, 2015



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