NADIR HASNAIN


शादाब शजर ख़ुशहाल बशर इंसाफ़ अगर ना पाएगा - Poem by NADIR HASNAIN

शादाब शजर ख़ुशहाल बशर इंसाफ़ अगर ना पाएगा
उस वीरान शहर में पंछी लौट के फिर क्यों आएगा
रहबर ही जब ज़हर है घोले अपने शहर की माटी पर
ऐसे शहर के मज़लूमों को अदल कहाँ मिल पाएगा

भाई ख़ून का पेयासा है और घर मेरा शमशान बना
जबसे मेरे नगर का हाकिम एक वहशी शैतान बना
ख़ौफ़ के मारे थर थर काँपे हर तन्हा मजबूर यहाँ
देश का दुश्मन बना ख़लीफ़ा मुजरिम क्यों घबराएगा

किया धमाका ग़द्दारों ने जो माँ का सौदा करते हैं
सुन वहशी शैतान दरिंदे मासूम हज़ारों मरते हैं
क्या बीतेगी सोच ज़रा तू ख़ून के आँसू रोएगा
तेरे जिगर का टुकड़ा भी जब ज़द में एक दिन आएगा

मासूमों के ख़ून से खेले मोमिन वोह बेदर्द नहीं
अमन का पैकर दीन का दाई मुस्लिम दहशतगर्द नहीं
देख रहा है जग का दाता जोश में जिस दिन आएगा
ऐ ज़ालिम मिट जाएगा तू खाट पड़ा रहजाएगा

हाथ में क़ुरान सर पे टोपी विर्द ख़ुदा का करता है
हर इल्ज़ाम बता दे नादिर उसी के सर क्यों पड़ता है
माँ का आँचल सूना करके तड़प रहा है जेलों में
वोह मज़लूम मुसलमा फिर से लौट के घर कब आएगा
: नादिर हसनैन

Topic(s) of this poem: sadness

Form: ABC


Comments about शादाब शजर ख़ुशहाल बशर इंसाफ़ अगर ना पाएगा by NADIR HASNAIN

  • Mohammed Asim Nehal (11/14/2015 1:15:00 AM)


    DIl ko choo jaane wali nazm hai....Bahut khoob.... (Report) Reply

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Poem Submitted: Saturday, November 14, 2015



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