दास्ताँ Poem by vivek pathak

दास्ताँ

इस फिरका परस्ती में एक कवि ढूंढ रहा हूँ
जो जला न सके ऐसा रवि ढूंढ रहा हूँ
यूं तो गोते लगाये हैं ख़्वाबों ने कुछ ऐसे
खुद के आँगन में अपनी छवि ढूंढ रहा हूँ

गीत गाये थे कभी उन मैखानो में
खुद को खोज था कभी उस ज़माने में
अब तो अन्दाजें बयां क्या कहने
शमाँ में जला डाला खुद को परवाने ने

हाशिये पे है ज़िन्दगी शब्द सुने हो गए
गाये थे गीत जो अब अनसुने हो गए
कैसे कहें दिल की बात कुछ दबा सा है
पराये थे जो वो अब अपने हो गए

इन्हीं सब ख्यालों में खुद को ढूंढ रहा हूँ
जो हो गया हो अपना उसे अब ढूंढ रहा हूँ
यूं ही बातों बातों में बीती जाती है ज़िन्दगी
कोई अपना सा हो उसे अब ढूंढ रहा हूँ

Thursday, March 10, 2016
Topic(s) of this poem: life
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