कुछ लोग मुझे बुरा कहते हैं
कुछ लोग सरफिरा कहते हैं
कुछ लोग कहते हैं अनाड़ी
और कुछ कहते हैं छिपा ख़िलाड़ी
इन सब उपनामों में मैं अपना नाम भूल गया
करना क्या था इस जहाँ में अपना काम भूल गया
अब इस उम्र में मुझे अपना नाम भी अजब लगता है
मुझे क्या चाहिए ये सोचना भी गजब लगता है
क्या कहूँ क्या लिखूं कुछ समझ नहीं आता
क्या करूँ कहाँ जाऊं अब मुझे कई नहीं बताता
कुछ गुमसुम कुछ उदास कुछ तन्हा सा हूँ
तेरी इस ज़िन्दगी का भटका एक लम्हा सा हूँ
सोचता हूँ कि कहीं तुझसे कुछ बात तो होगी
राह चलते कहीं कोई मुलाकात तो होगी
इन्हीं सब ख्यालों में बस बढता जाता हूँ
इस मुस्कुराती ज़िन्दगी में बस चलता जाता हूँ
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''इस मुस्कुराती ज़िन्दगी में बस/ चलता जाता हूँ'' Bohoot hi khoobsurat lines hai ye.. Sukhriya iss kavita ko hum se baat ne ke liye Vivek.