उपनाम Poem by vivek pathak

उपनाम

कुछ लोग मुझे बुरा कहते हैं
कुछ लोग सरफिरा कहते हैं
कुछ लोग कहते हैं अनाड़ी
और कुछ कहते हैं छिपा ख़िलाड़ी

इन सब उपनामों में मैं अपना नाम भूल गया
करना क्या था इस जहाँ में अपना काम भूल गया
अब इस उम्र में मुझे अपना नाम भी अजब लगता है
मुझे क्या चाहिए ये सोचना भी गजब लगता है

क्या कहूँ क्या लिखूं कुछ समझ नहीं आता
क्या करूँ कहाँ जाऊं अब मुझे कई नहीं बताता
कुछ गुमसुम कुछ उदास कुछ तन्हा सा हूँ
तेरी इस ज़िन्दगी का भटका एक लम्हा सा हूँ

सोचता हूँ कि कहीं तुझसे कुछ बात तो होगी
राह चलते कहीं कोई मुलाकात तो होगी
इन्हीं सब ख्यालों में बस बढता जाता हूँ
इस मुस्कुराती ज़िन्दगी में बस चलता जाता हूँ

Thursday, March 10, 2016
Topic(s) of this poem: respect
COMMENTS OF THE POEM
Souren Mondal 10 March 2016

''इस मुस्कुराती ज़िन्दगी में बस/ चलता जाता हूँ'' Bohoot hi khoobsurat lines hai ye.. Sukhriya iss kavita ko hum se baat ne ke liye Vivek.

0 0 Reply
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success