vivek pathak

vivek pathak Poems

कुछ लोग मुझे बुरा कहते हैं
कुछ लोग सरफिरा कहते हैं
कुछ लोग कहते हैं अनाड़ी
और कुछ कहते हैं छिपा ख़िलाड़ी
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इस फिरका परस्ती में एक कवि ढूंढ रहा हूँ
जो जला न सके ऐसा रवि ढूंढ रहा हूँ
यूं तो गोते लगाये हैं ख़्वाबों ने कुछ ऐसे
खुद के आँगन में अपनी छवि ढूंढ रहा हूँ
...

The Best Poem Of vivek pathak

उपनाम

कुछ लोग मुझे बुरा कहते हैं
कुछ लोग सरफिरा कहते हैं
कुछ लोग कहते हैं अनाड़ी
और कुछ कहते हैं छिपा ख़िलाड़ी

इन सब उपनामों में मैं अपना नाम भूल गया
करना क्या था इस जहाँ में अपना काम भूल गया
अब इस उम्र में मुझे अपना नाम भी अजब लगता है
मुझे क्या चाहिए ये सोचना भी गजब लगता है

क्या कहूँ क्या लिखूं कुछ समझ नहीं आता
क्या करूँ कहाँ जाऊं अब मुझे कई नहीं बताता
कुछ गुमसुम कुछ उदास कुछ तन्हा सा हूँ
तेरी इस ज़िन्दगी का भटका एक लम्हा सा हूँ

सोचता हूँ कि कहीं तुझसे कुछ बात तो होगी
राह चलते कहीं कोई मुलाकात तो होगी
इन्हीं सब ख्यालों में बस बढता जाता हूँ
इस मुस्कुराती ज़िन्दगी में बस चलता जाता हूँ

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