Shashikant Nishant Sharma

Rookie - 133 Points (03 September,1988 / Sonepur, Saran, Bihar, India)

मेरी परदादी... - Poem by Shashikant Nishant Sharma

वह अधेर उम्र की
मेरी बूढी परदादी
वह झुर्रीदार चेहरा
आँखों में नयी उम्मीद के तारा
वह जर्जर शरीर
वह शरीर का अस्थि-पंजर
वो ज्यादा मोटी नहीं थी
शायद इसी कारण वो
उम्र के इस अवस्था में भी
चल फिर सकती थी
उनके वर्फ से सफ़ेद बाल
उनकी उम्र का सही
अनुमान लगाना मुश्किल था
पर शायद वे ९० साल के होगी
वर्षों बाद आज वो याद आई
हम बच्चें कहते थे उन्हें दाई
वो इतनी बूढी होकर भी
अपने पैरों पे चलती थी
बच्चों के संग खेलती थी
अपने संग सुलाती थी
एक से बढकर एक कहानी सुनती थी
याद है वो कहानियां
जिसमे हुआ करती थी
एक राजा की कई रानियाँ
उन कहानियों के राजकुमारियां
और वे स्वर्ग की परियां
हमें याद है वो बचपन की आजादी
और एरी प्यारी बूढी परदादी
सुबह शाम टहलती
खेत खलिहान जाती
वे खत जो है घर से दूर
जहा खटते थे मजदुर
मजदूरों के लिए खाना पहुँचाना
खेतों में बबर बार आना जाना
याद है हमें वो खेतों की पगडंडियों
पे बैठ कर दोपहर का खाना खाना
वो पम्पिंग सेट का मशीन
वो नाहर का पानी
जिससे होती थी खेतों की सिंचाई
कभी गेंहूँ धान तो कभी सरसों राई
वो झोपड़ी में बैठी
लिए हाथ में लाठी
मशीन के देखभाली
वो खेतों की रखवाली
वही पे हमारी दाई
देती थी हम बच्चों को लाई
हमारे घर के पिछ्वारी
रहती थी गइया हमारी
वो गाय का बछरा
उछल कूद करता
सबको लुभाता
वो मरखंडी गाय
सबको दूर भगाय
सिंग से मरी हमको ढाय
गिरा था मैं धाम से, हाय!
आ गई मुझे रुलाई
वही थी मेरी दाई
जो हमकों बचाई
गोद में उठाकर
हिलाकर डुलाकर, मुझे बहलाई
मुझे चुप कराइ
वो कितने अच्छी थी, भाई!
ज्यादा नहीं जनता हूँ
पर जितना जनता हूँ
वो थी बहुत प्यारी
वो परदादी हमारी
उम्र के अंतिम छणों में
वो पारी थी बिस्तर पे
हम अपने चाचा के संग
ले रहे थे खेत में बुबाई का उमंग
खेत में थी हर बैल
हम रहे थे वही खेल
घर से आया बुलावा
दाई अंतिम सांसें गिन रही
वो नब्बे के दशक पर कर चुकी थी
अपनी उम्र जी चुकी थी
इस दुनियां में
आया बुलावा उस दुनियां से
गई वो स्वर्ग सिधार
हुआ आत्मा का उद्धार
चढ़ यमराज के रथ
छोर चली ये जीवन पथ
वो मेरी परदादी!
शशिकांत निशांत शर्मा 'साहिल'


Comments about मेरी परदादी... by Shashikant Nishant Sharma

There is no comment submitted by members..



Read this poem in other languages

This poem has not been translated into any other language yet.

I would like to translate this poem »

word flags

What do you think this poem is about?



Poem Submitted: Tuesday, January 29, 2013



[Report Error]