भटकन* Poem by C. P. Sharma

भटकन*

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सांई इस संसार में
भांत भांत के लोग
समझो तो सब एक हैं
न समझो तो अनेक

हरेक में है मेरी झलक
खुद के जलवों का आशिक हूँ मैं
खुदाई से भटका हुआ
मुझे खुद की ही तलाश है

अजीबो गरीब है ज़िन्दगी
खुद से ही रूबरू मुश्किल हुई
उम्रभर साथ साथ रहें
फिर भी गुफ्तगू कभी न हुई

*प्रेरणा: Aarti Mittal on fb

भटकन*
COMMENTS OF THE POEM
Rajnish Manga 18 April 2016

जीवन के क्रियाकलाप पर दार्शनिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती एक सुंदर कविता. हम सब अपनी वास्तविकता को जानने की कोशिश में भटक रहे हैं. धन्यवाद.

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C. P. Sharma

C. P. Sharma

Bissau, Rajasthan
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