मुसाफिर हूँ मुहब्बत का सफर मेरी मुक़द्दर है Poem by NADIR HASNAIN

मुसाफिर हूँ मुहब्बत का सफर मेरी मुक़द्दर है

Rating: 4.5

मुसाफिर हूँ मुहब्बत का सफर मेरी मुक़द्दर है
सभी आशिक़ यहाँ पे हैं जो पाले वह सिकंदर है
तुझे हर मोर से मुड़ कर मेरे ही पास आना है
हर एक नदियाँ जहाँ मिलती मेरा दिल वह समंदर है

मेरा दिल तो ये दर्पण है उसे देखो ज़रा आकर
मेरी दुनियां भी बदलेगी रहूँगा ख़ुश तुझे पाकर
नहीं झूठा मैं आशिक़ हूँ ये जाने है ख़ुदा मेरा
ज़ुबाँ पर बात जो आई वही दिल के भी अंदर है

हुआ बीमार दिल मेरा तुझे देखा हूँ मैं जबसे
कभी ना छूट ये पाए यही है बस दुआ रब से
अंधेरी रात भी रौशन हुई वह रौशनी है तू
हसीनों में हंसीं जानम तुहि तो एक सुन्दर है

ये इश्क़ व प्यार की बातें मुझे तो झूट लगते थे
मुहब्बत की ये दुनिया से बहोत ही दूर रहते थे
नहीं ख़ुद को बचा पाया तेरी क़ातिल निगाहों से
तेरी मुस्कान के आगे किया मैंने सरेन्डर है

By: नादिर हसनैन

COMMENTS OF THE POEM
M Asim Nehal 10 February 2017

Bahiut Khoob, Maza aagaya padh kar...

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