Monday, May 30, 2016

डोर से बंधी, आकाश को छूने चली … Comments

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डोर से बंधी, आकाश को छूने चली …
क्या हमारा जीवन इस पतंग की तरह नहीं है
हम सब भी किसी न किसी डोर से बंधे है
और आकाश को छूना चाहते हैं
...
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M. Asim Nehal
COMMENTS
Akhtar Jawad 03 June 2016

A wonderful and thoughtful poem, I loved it.

4 0 Reply
Rajnish Manga 30 May 2016

बहुत सुंदर. आपकी हर रचना में जीवन का दार्शनिक विश्लेषण देखने को मिलता है जो बहुत rare है. धन्यवाद. क्या हमारा जीवन इस पतंग की तरह नहीं है वो पतंग ही क्या जो ज़मीन पर रहे और आसमान का मज़ा न चखे

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M. Asim Nehal

M. Asim Nehal

Nagpur
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