डोर से बंधी, आकाश को छूने चली …
क्या हमारा जीवन इस पतंग की तरह नहीं है
हम सब भी किसी न किसी डोर से बंधे है
और आकाश को छूना चाहते हैं
...
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बहुत सुंदर. आपकी हर रचना में जीवन का दार्शनिक विश्लेषण देखने को मिलता है जो बहुत rare है. धन्यवाद. क्या हमारा जीवन इस पतंग की तरह नहीं है वो पतंग ही क्या जो ज़मीन पर रहे और आसमान का मज़ा न चखे
A wonderful and thoughtful poem, I loved it.