मेरी चुप सी ज़िंदगी में
तुम किसी साज़ की तरह से आई हो
दो घड़ी की है मुलाक़ात
मगर जाने क्यों
ऐसा लगता है की बरसों की शनासाई है
कोई लम्हा बिन तुम्हारे
अब सदियों का इंतज़ार लगता है
मानाे दिल के आफ़ताब पर छाए
ये काले घनेरे बादल कभी छँटेंगे ही नहीं
मगर जब तुम्हारे कदमों की आहट सुनकर
कल उठता है सीने में
मुन्तजि़र हूँ तुम्हारा कईं अरसों से
तुम छाँव हो
जि़न्दगी की पड़ती कड़ी धूप में मुझपर
तुम साज़ हो
एक ख़ूबसूरत नज़्म का
तुम्हारे लिए ग़ज़ल क्या लिखूँ
तुम्हारा तो नाम ही मैंने ग़ज़ल रख़ा है
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