मेरी चुप सी ज़िंदगी में तुम Poem by abhilasha bhatt

मेरी चुप सी ज़िंदगी में तुम

मेरी चुप सी ज़िंदगी में

तुम किसी साज़ की तरह से आई हो

दो घड़ी की है मुलाक़ात

मगर जाने क्यों

ऐसा लगता है की बरसों की शनासाई है

कोई लम्हा बिन तुम्हारे

अब सदियों का इंतज़ार लगता है

मानाे दिल के आफ़ताब पर छाए

ये काले घनेरे बादल कभी छँटेंगे ही नहीं

मगर जब तुम्हारे कदमों की आहट सुनकर

कल उठता है सीने में

मुन्तजि़र हूँ तुम्हारा कईं अरसों से

तुम छाँव हो

जि़न्दगी की पड़ती कड़ी धूप में मुझपर

तुम साज़ हो

एक ख़ूबसूरत नज़्म का

तुम्हारे लिए ग़ज़ल क्या लिखूँ

तुम्हारा तो नाम ही मैंने ग़ज़ल रख़ा है

COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success