अजीब-ओ गरीब हैं रिश्ते
ढलती उम्र में बदलते
खेले पले थे जिन के साथ हम
आज वो ही रास्ते बदलते
जिन को उंगली पकड़ के चलाया
अब हम से नज़रें चुराते
जिन को न जानते थे पाहिले
अब अपने से लगने लगे हैं
आखिर जिस्म भी न दे साथ
अजीब -ओ -गरीब हैं
जिस्मानी रिश्ते! ! ! !
नारद थे नारायण के भक्त
जब नारायण रूप उन ने माँगा
वानर रूप मिलने पे किया श्रापित
नारायण को वन वन भटकने
सिया विरह में तड़फने
अजीब-ओ -गरीब हैं जिस्मानी रिश्ते
जो खुदा को भी ज़मीं पे आने पर
मज़बूर कर दे दर दर भटकने
अजीब-ओ -गरीब है
ज़िस्म-ओ-रूह के रिश्ते
न किसी ने जाना
न कोई जानेगा
अनजान राहों में
यों ही भटकते
गुज़र रहा है
गुज़र जायेगा
कौन हैं हम?
नहीं जान पायेगा
कई जन्मों में लिपट जाएगा
बादलों की तरह
कहीं से उठेगा
कहीं बरस जाएगा
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