तू जब मिले तो
फूल खिलें और
खिले कमल सी काया
ऐसे प्रियतम कृष्ण का अब तक
मैंने पार न पाया।
छलिया बैठा
मेरे ही भीतर
मैं द्वार द्वार भटकूँ
मेरे ही नयनों में वो बसा
अपने ही नयन मैं कैसे देखूँ?
ये अब तक जान न पाया।
द्वैत बिन कुछ समझ न आये
पर इस में माया उलझाए
द्वैत जाल में फंसा हुआ
तुझ को जान न पाउं।
तू जब मिले तो
फूल खिलें और
खिले कमल सी काया
ऐसे प्रियतम कृष्ण का अब तक
मैंने पार न पाया।
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