जीवन सार Poem by C. P. Sharma

जीवन सार

मोहब्बत व नफ़रत हैं ज़िन्दगी के रंग
न जाने क्यों लोग हो जाते इन से तंग
परमानन्द ने भी की स्व-नीरसता भंग
प्रसव पीड़ा सही, ली नव जीवन उमंग

विविधताओं से भरा है ये जीवन मंच
इसे मृग तृष्ना कहो या जीवन प्रपंच
यही पर निर्माण है और यहीं विध्वंस
यहीं हुए कृष्ण और यहीं जन्मा कंस

लिँग-भेद निहित, सतत संसृति सन्देश
विरोधाभाषों से भरा है ये जीवन प्रवेश
जीवन मृत्यु का यहाँ है विचित्र संयोग
ब्रह्मांड संतुलन का बना इसी में योग

ये विसंगतियां न होती तो न होता संसार
इन्ही में बसा है निस्सार जीवन का सार
तू हँस सके तो हँस ले, बन के एक दृष्टा
कर्ता बन रो ले अगर ईश्वर में नहीं निष्ठा

जीवन सार
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C. P. Sharma

C. P. Sharma

Bissau, Rajasthan
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