शांति से रहो Poem by C. P. Sharma

शांति से रहो

Rating: 5.0

मैं मस्त हवाओं में बहूं
मेरे अनेक रूप और भेख
जो भी तेरे मन को भावे
उस में ही मुझे देख

समूह प्रकृति में ही है
मेरे रूपों की अभिव्यक्ति
सभी भेख हैं मेरे ही
इन्ही में देख समष्टि

मैं ही हिन्दू हूँ
मैं ही मुस्लिम और इसाई
मेरे सिवा कुछ भी नहीं
मैं हूँ दीन -ए -ईलाही

मैंने ही लिखी गीता
मैंने ही लिखा क़ुरान
मुझ में ही बाईबिल पढो
गुरु ज्ञान मेरे प्राण

न करो मुझे विभाजित
मैं ही हूँ सर्वत्र
समस्त सृष्टि रूप में
मैं ही हूँ एक मात्र

जब जब कहीं भी खून बहे
मुझ पे ही है जख्म
एक दूसरे के लिए जीवो
स्वार्थ को करो ख़त्म

गीत और संगीत का
मुझ में है प्रसार
सौंदर्य भी है मुझ में
मुझे करो न शर्मसार

हर महक है मुझ में
उसका आनंद लो
आनंद ही सर्वत्र है तो
फिर क्यों हिंसा करो? ? ?

शांति से रहो
Thursday, September 8, 2016
Topic(s) of this poem: peace
COMMENTS OF THE POEM
Rajnish Manga 08 September 2016

उक्त कविता में कवि ने यही समझाने का यत्न किया है कि सारे जग का नियामक या निर्माता परमात्मा एक है. सभी धर्म और उनकी आधार पुस्तकें उसकी ही रचनायें हैं. फिर यह खून खराबा क्यों? सब मिलजुल कर क्यों न रहें? कविता की भाषा तथा लय मन को आकर्षित करती है. बहुत सुंदर, सी.पी. शर्मा जी. जब जब कहीं भी खून बहे / मुझ पे ही है जख्म एक दूसरे के लिए जीवो / स्वार्थ को करो ख़त्म आनंद ही सर्वत्र है तो / फिर क्यों हिंसा करो? ? ?

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C. P. Sharma

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Bissau, Rajasthan
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