आज संवेरे
पौ फटी का समय था,
मैं चाय की चुस्कियां ले रहा था।
गेट के साथ वाले वृक्ष पे
एक कली खिली,
पुष्प बनी,
मुस्कुराई,
मुझ से नजरें मिलाई।
बात कुछ इस तरह बढ़ाई,
सुनोगे मेरी कहानी?
मैंने स्वीकृति में
गर्दन हिलाई।
चंद शब्दो में उसने कहा:
कल ही तो मेरा जन्म हुआ,
चंद घंटों की मेरी जवानी है,
संध्या होते ढल जानी है।
मेरा जीवन उद्देश्य यही
शुभ कर्मों की शोभा बढ़ानी है,
मुझे प्रभु चरणों में पंहुचा दो.
पल दो पल मेरी जवानी है।
भ्रमित त्रसित जो वहां आते
उनके जीवन को महकना है
मेरा जीवन तो एक मात्र उनकी
खुशियों का एक बहाना है।
मैं शर्मसार हुआ ये बातें सुन
एक तुच्छ पुष्प की अभिलाषा
मानव कहे मैं सरताज जगत का
क्या हो सकती है उस से ये आशा?
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