खूबसूरत ज़िन्दगी Poem by C. P. Sharma

खूबसूरत ज़िन्दगी

रूह हैं तो क्यों न हम एक रूह हो जाएँ?
दोस्ती के खूबसूरत बंधन में बंध जाएँ?

ज़िन्दगी से नफ़रत क्यों न फेंकें निकाल?
जो बन गई है विश्व में विभीषिका विक्राल

जब सभी धर्म कहते अल्लाह एक है
क्यों सब ने उसके नाम रखे अनेक हैं?

लड़ते हैं आपस में हम उसके नाम पे
उस एक की औलाद, रहो भाई चारे से

भाईचारे में ही ख़ुदा की रहमत है
नहीं तो ज़िन्दगी में सिर्फ़ फ़ज़ीहत है

क्यों न रहमतों से अपनी झोली भरलें हम! ! !
ज़िन्दगी से हमेशा के लिए मिटा दें ग़म

खूबसूरत ज़िन्दगी
Sunday, November 20, 2016
Topic(s) of this poem: friendship,life,love
COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
C. P. Sharma

C. P. Sharma

Bissau, Rajasthan
Close
Error Success