बिन कांटे भी क्या ज़िन्दगी है? * Poem by C. P. Sharma

बिन कांटे भी क्या ज़िन्दगी है? *

गर ज़िन्दगी से 
करते हो प्यार तो 
काँटों से प्रीत करलो 
गर न होते ये कांटे 
तो फिर गुलाब कैसे खिलते?  
गर न होते मसायाल ज़िन्दगी में
तो फिर हम ये ख़्वाब कैसे बुनते?  
बिन सवालों भी क्या है ये ज़िन्दगी 
जवाबे सवाल ही तो है ज़िन्दगी 
इस उधेड़ बुन में ही है 
ज़िन्दगी की महक 
इन सब के बिन है 
वीरान जीवन 
नीरस है जीवन 
ये शरीर शव है

*Gurneer Sahni ji के सेवा समर्पित कार्यों के लिए।

बिन कांटे भी क्या ज़िन्दगी है? *
Saturday, October 8, 2016
Topic(s) of this poem: life,lifestyle
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C. P. Sharma

C. P. Sharma

Bissau, Rajasthan
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