संसृति संगीत Poem by C. P. Sharma

संसृति संगीत

मैं सर्वश्रेष्ठ 
मैं समय मुक्त 
सब ब्रह्मांडों में 
विचरण करता 
न बंधा हु मैं आकृतियों में 
आकृतियां मुझ से सुशोभित हैं।

जीवन मृत्यु से मैं भयभीत नहीं 
मैं ही सांसारिक कुशल क्षेम 
निर्माण में मैं संलिप्त रहूँ 
न लेशमात्र संताप मुझे 
मैं समय मुक्त 
मैं सर्वश्रेष्ठ।

मैं नहीं लिखता कोई धर्मग्रन्थ 
कर्तव्य निहित मेरा आदेश 
जो भी तुझे दिखे विकसे 
वहीँ मेरा सौन्दर्य बसा 
दिव्य तेज पुंज हूँ मैं 
रात्रि है विश्राम गृह।

जो सजी धजी पोषक दिखे 
मेरी ही माया कृतियाँ हैं वो 
मृत्यु में निस्सार संसार तजूं 
निज धाम को जा परमानंद बनू 
न मित्र मेरा न शत्रु कोई 
निर्लेप निरंजन वहां रहूँ 
इस जीव जगत का 
पालन मैं करूँ।
ये कठपुतलियों का खेल मेरा 
इनके धागे मेरी अँगुलियों में फंसे 
ये जो तीलियों का संसार बसा 
इनकी गति से उपजे विनसे 
इस गति के पागलपन में 
संसृति का संगीत बसे।
मैं सर्वश्रेष्ठ 
मैं समय मुक्त 
सब ब्रह्मांडों में 
विचरण करता 
न बंधा हु मैं आकृतियों में 
आकृतियां मुझ से सुशोभित हैं।

संसृति संगीत
COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
C. P. Sharma

C. P. Sharma

Bissau, Rajasthan
Close
Error Success