मुझे क्या चाहिए? Poem by C. P. Sharma

मुझे क्या चाहिए?

मैं क्या लिखूँ?
मैं क्या कहूँ?
इंसा नहीं मैं इस जहाँ का
यहाँ अमीर कुदरत में
ग़ुरबत बसे
रंग भेद के जाल में
यहाँ लोग फंसे

यहाँ आदमी, आदमी से लड़े
यहाँ हर जगह नफ़रत के झंडे गड़े
यहाँ धर्म आपस में नहीं जोड़ता
यहाँ धर्म इंसां को इंसानियत से तोड़ता

यहाँ सीमा रेखाओं में इंसां बटा
ये कैसा है इंसां बड़ा अटपटा
इस की इंसानियत से मैं हूँ डरा
हर जगह है नुक्लेअर का ख़तरा

मेरा दिल रहे जहाँ मोहब्बत बसे
जिस चमन में हर रंग के गुल खिलें
सब आपस में दरियादिल हो मिलें
एक दूजे के दुःख दर्द को बाँट लें

जंगलों के हकदरों को जंगल मिलें
कस्बों वालों को भर पेट रोटी मिले
प्लास्टिक मनी का गुबारा नहीं चाहिए
शोषक माया का पसारा नहीं चाहिए

मुझे ऊँची इमारतें नहीं चाहिए
मुझे तो बस दो गज़ जमीं चाहिए
हक़ मार के अमीरी नही चाहिए
मुझे मोहब्बत भरी ज़िन्दगी चाहिए

COMMENTS OF THE POEM
Divya 03 March 2018

Mujhe kya krna h muje nhi pta but mujhe kuch acha krna h kuch smj nhi aa rha ki kya kru

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C. P. Sharma

C. P. Sharma

Bissau, Rajasthan
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