अहं ब्रह्मास्मि Poem by C. P. Sharma

अहं ब्रह्मास्मि

असतित्व की सच्चाई 
सब मुझ में समाई
अज्ञान के अँधेरे में 
पथभ्रष्ट है ये भाई।

मुझ से नहीं मैं वाक़िफ़
मैं उसको कैसे जानूँ
उसे जानने से पाहिले
खुद को तो मैं पहचानूँ।

मैं ही हूँ वो कड़ी
जिस से सृष्टि जुडी है
गर ख़ुद को न जाना
जग मित्थ्या पुड़ी है।

अहं ब्रह्मास्मि
Saturday, December 10, 2016
Topic(s) of this poem: truth
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C. P. Sharma

C. P. Sharma

Bissau, Rajasthan
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